दो कदम
जिन्दगी तुझसे कह रहा है, छोड़ो दो अब बहाना ना बनो किसी का निशाना। अपने को खबर कर हो जाओ बेखबर, खुद पर विश्वास रख बस दो कदम आगे तू बढ़ ।। मंज़िल को जब पाना है, छोड़ देना है बहाना गिरने के डर से कब तक चलना ना सीखोगे अपने हालात का कब तक रोना रोओगे ये वक्त नहीं है रोने का ना ही जस्बातो मे बहने का पाने जब इच्छा हो मन में फिर खोने से क्या डरना बस दो कदम आगे तू बढ़ ।। अपनी किस्मत जब खुद ही लिखना हो फिर भाग्य भरोसे क्यों हैं बैठना। ये सोचकर मत घबराना, तेरा रहबर कोई नहीं है तेरे बढ़ते कदम देख ना जाने कितने ही रहबर बन जाएगा बस दो कदम आगे तू बढ़ ।। एकलव्य को स्मरण में रखो , उसका रहबर कोई ना था एक द्रोणाचार्य का मूर्ति के अनुसरण कर अपने मंजिल तक पहुंच गया वो फिर इस डिजिटल युग में अकारण ही है यह चिंता अपने लक्ष्य पर तू केन्द्रित कर, रास्ता स्पष्ट दिख जाएगा, बस दो कदम आगे तू बढ़ ।। जैसे- जैसें आगे बढ़ पाओगे अपनी मंजिल को करीब पाओगे एक समय आएगा तू अपने मंजिल को पाएगा ना बनेगा किसी का निसाना ना ही कहलायेगा बेचारा इन शब्दों से छुटकारा पाकर सचमुच बहुत सकून पाएगा ...

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